पुनर्वसु नक्षत्र
पुनर्वसु सातवाँ नक्षत्र है, जो मिथुन राशि के 20° से कर्क राशि के 3°20′ तक फैला है। जन्म के समय चंद्रमा यहाँ हो तो पुनर्वसु आपका जन्म नक्षत्र है। इसका सार है लौटना और फिर से खिलना: तूफ़ान के बाद लौटती रोशनी और घर लौटता शुभ।
एक नज़र में
- विस्तार
- 20° मिथुन – 3°20′ कर्क
- स्वामी ग्रह (दशा)
- गुरु
- देवता
- अदिति (देवों कि माता)
- प्रतीक
- धनुष और तरकश
- गण
- देव गण
- नाड़ी
- वात
- योनि
- बिल्ली
- लिंग
- स्त्री
- शुभ दिशा
- उत्तर
- रंग
- सीसा
- रत्न
- पुखराज रत्न
चार पद
- पद 120°–23°20′ मिथुननवांश मेषनाम का अक्षर: के
- पद 223°20′–26°40′ मिथुननवांश वृषभनाम का अक्षर: को
- पद 326°40′–30° मिथुननवांश मिथुननाम का अक्षर: हा
- पद 40°–3°20′ कर्कनवांश कर्कनाम का अक्षर: ही
पुनर्वसु का अर्थ
‘पुनः’ यानी फिर से और ‘वसु’ यानी शुभ, धन या प्रकाश; इसलिए पुनर्वसु का अर्थ है ‘शुभ का लौट आना’। तूफ़ानी आर्द्रा के ठीक बाद आने वाला यह नक्षत्र बारिश के बाद खुले आसमान जैसा है।
इसका स्वामी गुरु (बृहस्पति) है, जो ज्ञान, आस्था, आशा और विकास का ग्रह है। इसके तीन पद बुध की राशि मिथुन में और अंतिम पद कर्क राशि में हैं, जहाँ गुरु उच्च का होता है।
अदिति माता और धनुष-तरकश
पुनर्वसु की देवी अदिति हैं, देवताओं और आदित्यों की माता। अदिति असीम आकाश और बिना शर्त वाले स्नेह का प्रतीक हैं: ऐसी माँ जो आश्रय भी देती है और स्वतंत्रता भी। पुनर्वसु के जातकों में अक्सर यही उदार, क्षमाशील स्वभाव दिखता है।
इसका प्रतीक धनुष और तरकश है। धनुर्धर तीर छोड़ने से पहले उसे पीछे खींचता है, और तरकश के तीर बार-बार काम आते हैं। यह सुंदर संयोग है कि धर्म के महान धनुर्धर भगवान श्रीराम का जन्म पुनर्वसु नक्षत्र में हुआ, और उनकी कथा भी वनवास के बाद घर लौटने की है।
स्वभाव और व्यक्तित्व
पुनर्वसु के जातक दयालु, आशावादी और सादगी में संतुष्ट रहने वाले होते हैं। ये प्रायः धार्मिक या दार्शनिक स्वभाव के होते हैं, सीखना पसंद करते हैं और अच्छी सलाह देते हैं। देव गण इन्हें क्षमाशील और मिलनसार बनाता है; यात्रा और फिर घर लौटने का सुख इन्हें बहुत भाता है।
कभी ये ज़रूरत से ज़्यादा भरोसा कर लेते हैं या थोड़े में संतुष्ट होकर अवसर छोड़ देते हैं। स्पष्ट लक्ष्य और कभी-कभी ‘ना’ कहना सीखें, तो इनकी अच्छाई और मज़बूत बनती है। मुश्किलों के बाद मुस्कुराकर फिर शुरुआत करना इनकी सबसे बड़ी ताक़त है।
पुनर्वसु नक्षत्र के चार पद
पहला पद (मेष नवांश, मिथुन राशि): ऊर्जावान और उद्यमी, विचारों पर तुरंत अमल करने वाले।
दूसरा पद (वृषभ नवांश, मिथुन राशि): व्यावहारिक और धैर्यवान, धीरे-धीरे धन और सुख जुटाने वाले।
तीसरा पद (मिथुन नवांश, मिथुन राशि): बौद्धिक और वाक्पटु, लेखन, अध्यापन और व्यापार में आगे।
चौथा पद (कर्क नवांश, कर्क राशि): सबसे भक्तिपूर्ण पद, नवांश में गुरु उच्च; परिवार-प्रिय, सेवाभावी और आध्यात्मिक।
करियर और धन
पुनर्वसु के लिए अध्यापन, काउंसलिंग, लेखन, प्रकाशन, कानून, पुरोहित और धार्मिक कार्य, यात्रा और आतिथ्य, तथा जनसेवा उपयुक्त हैं। उदार स्वभाव के कारण सामाजिक संस्थाएँ और उपचार से जुड़े पेशे भी अनुकूल हैं। कई लोग दूसरी पारी या नई शुरुआत में बड़ी सफलता पाते हैं।
नुकसान के बाद भी धन इनके पास लौट आता है। ईमानदार नियमित बचत और बिना लिखा-पढ़ी के उधार न देना इनके भरोसेमंद स्वभाव की रक्षा करता है।
विवाह और उपाय
विवाह में पुनर्वसु वफ़ादार, क्षमाशील और परिवार के प्रति समर्पित होता है, और ऐसा साथी चाहता है जो उसके मूल्यों और स्वतंत्रता का सम्मान करे। इसकी मार्जार (बिल्ली) योनि है, जिसका मेल मार्जार योनि से अच्छा और मूषक (चूहा) योनि से विरोधी माना जाता है। आदि (वात) नाड़ी होने से अलग नाड़ी का साथी बेहतर है, और देव गण का मेल देव व मनुष्य गण से अच्छा बैठता है।
उपाय के लिए भगवान राम या भगवान विष्णु की उपासना करें, रामायण या राम रक्षा स्तोत्र का पाठ करें और अदिति माता के लिए ‘ॐ अदित्यै नमः’ का जाप करें। गुरुवार को पूजा, गाय को भोजन और हल्दी या चने की दाल जैसी पीली चीज़ों का दान शुभ है। पुखराज गुरु का रत्न है, पर कोई भी रत्न पहनने से पहले अनुभवी ज्योतिषी से सलाह ज़रूर लें।
आपकी राशि और नक्षत्र क्या है?
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पुनर्वसु नक्षत्र का स्वामी कौन है?
पुनर्वसु नक्षत्र का स्वामी गुरु (बृहस्पति) है और देवी अदिति हैं। इसमें जन्म होने पर गुरु की महादशा से जीवन शुरू होता है।
पुनर्वसु नक्षत्र किस राशि में आता है?
पुनर्वसु के पहले, दूसरे और तीसरे पद मिथुन राशि में तथा चौथा पद कर्क राशि में आता है।
पुनर्वसु नक्षत्र के नाम अक्षर क्या हैं?
पुनर्वसु के अक्षर के, को, हा और ही हैं, पहले से चौथे पद के लिए। जैसे केशव, कोमल, हर्ष या हिमानी।
भगवान राम का जन्म किस नक्षत्र में हुआ था?
परंपरा के अनुसार भगवान राम का जन्म चैत्र शुक्ल नवमी को पुनर्वसु नक्षत्र में हुआ था, जिसे राम नवमी के रूप में मनाया जाता है।